रूर्बन मिशन फेल:7 साल में शहरों की तरह गांवों में विकास नहीं सड़कों पर कीचड़, रोजगार ट्रेनिंग का दिखावा

- प्रोजेक्ट लॉन्च करने के दौरान बताया गया था कि गांवों की स्थिति सुधरेगी, ऐसा नहीं हुआ
- मॉनिटरिंग नहीं: शुरुआती दौर में अफसर क्लस्टर के गांवों का दौरा करते थे, अब बंद कर दिए
केंद्र सरकार के ड्रीम प्रोजेक्ट में शामिल रूर्बन मिशन अपने निर्धारित लक्ष्य के अनुरूप सफल नहीं हो सका। मिशन की शुरुआत करने के बाद पांच साल में चयनित गांवों का विकास शहरों की तर्ज पर करना था, किंतु दो साल के भीतर ही मिशन ठप होने लगा। आज भी रूर्बन कलस्टर में शामिल गांवों की स्थिति नहीं बदल सकी है। मिशन के माध्यम से केवल वहीं कार्य ही हुए हैं जो पंचायत की मूलभूत सुविधाओं में शामिल हैं। सबसे ज्यादा सड़क व नाली निर्माण पर ही रािश फूंकी गई। जबकि पेयजल की किल्लत कई गांवों में बरकरार है।
21 फरवरी 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डोंगरगढ़ पहुंचकर इस प्रोजेक्ट की नींव रखी थी। मिशन शुरू होने के बाद पांच वर्षों तक गांवों में शहर की तरह विकास कार्य होने लगे। दैनिक भास्कर ने इन्हीं गांवों का दौरा कर ग्राउंड रिपोर्ट ली। रिपोर्ट में यही बात सामने आई कि रूर्बन मिशन से ग्रामीणों को काफी उम्मीदें थीं किंतु गांवों की स्थिति आज भी वैसे ही बनी हुई है। मिशन के माध्यम से चलाई जा रही सरकार की तमाम योजनाएं अब बंद हो चुकी हैं। इधर फंड नहीं मिलने से पंचायतों ने भी हाथ खड़े कर दिए और सेवा कार्यों को भी बंद करना पड़ गया। रूर्बन मिशन से बदलाव की तस्वीर नहीं दिखी। संबंधित गांवों के रहवासी जरूरी सुविधाओं के लिए भी तरस रहे हैं। उनकी परेशानी लगातार बढ़ती ही जा रही है।
योजनाओं का ऐसा है हाल
इस क्षेत्र के युवाओं को ट्रेनिंग तो दी गई पर सर्टिफिकेट नहीं दिया गया। बेरोजगार युवाओं के स्किल डेवलपमेंट के लिए सिलाई, कम्प्यूटर, बागवानी, उद्योग धंधे स्थापित करनें के लिए प्रशिक्षण दिया गया। लेकिन प्रशिक्षण के बाद उन्हें सर्टिफिकेट नहीं दे पाएं। एनजीओ के माध्यम से बेरोजगार को ट्रेनिंग दी गई। जब सर्टिफिकेट को लेकर सवाल पूछे गए तो एनजीओ के जिम्मेदार भी कुछ नहीं बता सके। इसकी वजह से प्रशिक्षम लेने वाले भटक रहे हैं।
मानदेय नहीं, काम बंद
मुरमुंदा कलस्टर में शामिल रूर्बन गांवों में डोर-टू-डोर कचरा कलेक्षन की शुरुआत की गई थी। शुरुआती दौर में कलेक्शन करने वाली महिलाओं को पंचायत के माध्यम से मानदेय दिया जाता था। किंतु सरकार ने मानदेय भेजना बंद कर फरमान जारी किया कि कचरों से निकलने वाले कबाड़ को बेचकर व यूजर चार्ज वसूलकर पंचायत मानदेय दें, लेकिन पंचायत भी व्यवस्था संभाल नहीं पाई तो महिलाओं ने कचरा कलेक्शन का काम बंद कर मजदूरी शुरू कर दी।
सड़क व नाली ही बनाई
रूर्बन मिशन से बदलाव लाने के लिए बड़े प्रोजेक्ट पर काम न होकर केवल सड़क व नाली निर्माण पर ही राशि फूंकी गई है। जबकि आज भी कई गांवों की सड़कों पर कीचड़ फैला है। पाइप लाइन के माध्यम से डोर-टू-डोर नल कनेक्शन देकर पेयजल संकट दूर करने की प्लॉनिंग भी धरी की धरी रह गई। जबकि पंचायत में अन्य कई मदों से मूलभूत सुविधाओं के लिए फंड शासन से हर साल मुहैया होती है। लेकिन अफसरों ने भी सड़क व नाली बनाने का ही प्रस्ताव भेजा।
यहां होना था विकास
योजना में मुरमुंदा को कलस्टर बनाया गया था। कलस्टर में मुरमुंदा, राका, हरनसिंघी, नागतराई, मुड़पार, जामरी, खलारी, मेंढ़ा, पिपरिया, पिनकापार, पटपर पंचायत को षामिल किया गया था। इन गांवों में कंपोस्ट शेड उपयोग बंद हो गया है। युवाओं व किसानों को प्रशिक्षण भी बंद हो चुका है। शहरों की तर्ज पर चमकानें की योजना फेल हो गई है। रूर्बन मिशन से पांच साल का लक्ष्य रखकर योजना के माध्यम से विकास होना था।
केंद्र सरकार से कोई नया फंड नहीं मिल रहा: सीईओ
जिला पंचायत सीईओ लोकेश चंद्राकर ने इस संबंध में बताया कि रूर्बन मिशन के तहत केंद्र सरकार से फिलहाल कोई नया फंड नहीं मिल रहा है। अभी जो राशि शेष है, उसे ही खर्च कर गांवों में विकास कार्य करा रहे हैं। काम अंतिम चरण में है। हमारी कोशिश है कि जल्द से जल्द इसे पूरा कर सकें। सीईओ ने बताया कि पूर्व में जिला पंचायत की ओर से शासन को नए क्लस्टर प्रपोजल भेजा गया है। उम्मीद है जल्द निर्णय होगा।



