पोला पर्व आज:पारंपरिक पर्व पोला पर शहर के घरों में होगी बैलों की विशेष पूजा, मिट्टी के बैलों से आज खेलेंगे बच्चे

- क्षेत्र में मान्यता पोरा के दिन से धान के दानों में दूध भरता है
प्रदेश का पारंपरिक पर्व पोरा सोमवार को मनाया जाएगा। इस दिन बैलों की पूजा की जाती है। छोटे बच्चों के लिए मिट्टी से बने बैल न केवल मनोरंजन का साधन है, बल्कि उसकी दौड़ भी आपस में कराते हैं। वैसे तो जिले में कहीं भी बैल दौड़ प्रतियोगिता नहीं होती, लेकिन घरों में बैलों की पूजा जरूर की जाती है।
इसलिए मिट्टी से बने बैल बाजार में बिकने के लिए आए थे। कचहरी चौक पर बिक्री के लिए पहुंचे इन बैलों की कीमत 40 से 80 रुपए प्रति जोड़ी थी। घरों में बन रहे ठेठरी-खुर्मी जैसे पारंपरिक व्यंजन पोरा के लिए घरों में ठेठरी-खुर्मी, बरा और गुड़हा चीला जैसे छत्तीसगढ़ी रोटियां बनाई गई हैं। सुबह नंदिया बइला, जांता पोरा की पूजा के बाद इन्हीं व्यंजनों का भोग लगाया जाएगा। वहीं किसान परिवारों में सुबह गाय-बैलों का स्नान-श्रृंगार किया जाएगा। मान्यता है कि श्रीकृष्ण को मारने के लिए कंस ने कई असुरों को भेजा था। इन्हीं में से एक था पोलासुर जिसका श्रीकृष्ण ने भाद्रपद अमावस्या के दिन वध किया था। पोरा मनाने की कई प्रमुख मान्यताओं में एक यह भी है।
इसलिए मनाया जाता है पोरा
पं. अनिल शर्मा ने बताया कि भाद्रपद मास की अमावस्या तिथि को मनाया जाने वाला पोला की खेती का दूसरा चरण पूरा होने की खुशी में मनाया जाता है। किसान फसल बढ़ने की खुशी में बैलों की पूजा कर कृतज्ञता जताते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि बैलों के सहयोग से ही खेती की जाती है। पोरा की पूर्व रात्रि गर्भ पूजन किया जाता है। इसी दिन अन्न माता गर्भ धारण करती है। अर्थात धान के पौधों मे दूध भरता है। इसी कारण पोरा के दिन किसी को भी खेत में जाने की अनुमति नहीं होती।



