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H3n2 वायरस: इन दिनों सर्दी के साथ बुखार व खांसी के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। रेटिंग के अनुसार, इसके पीछे का एक कारण मौसम में बदलाव है। मौसम बदलने वाले ये खतरनाक लोग हैं, लेकिन इसके लिए सिर्फ मौसम की मार के लिए जिम्मेदार नहीं है। दरअसल, इन्फ्लुएंजा-ए के सब-टाइप एच3एन2 (एच3एन2) वायरस की वजह से पहचान में फ्लू के मामले में तेजी से सामने आते हैं। इस वायरस का संक्रमण कोरोना वायरस की तरह ही चक्र और इसके लक्षण भी कोविड-19 जैसे ही हैं, जो सभी उम्र के लोगों पर असर डालता है। ऐसे में निर्णयों पर निर्णय लिया जाता है। जानें कैसे करें इससे अपना बचाव।
रोना संक्रमण के बाद आजलकल देश में H3N2 वायरस का संक्रमण तेजी से फैल रहा है। यह वायरस भी कोरोना की तरह श्वसन तंत्र यानी फेफड़ों पर हमला करता है। इसे हॉन्गकॉन्ग फ्लू भी कहते हैं। कोरोना वायरस और एच3एन2 के कई लक्षण बिल्कुल एकसमान हैं। अलग-अलग रिपोर्ट के मुताबिक, अभी भी विशिष्ट की अलग-अलग लैब में फ्लू के मरीज जो आकलन कर रहे हैं। उनमें से औसतन 10 में से 6 मामले H3N2 वायरस के मिल रहे हैं। इसकी वजह से अब तक देश में कई लोगों की जान भी जा चुकी है।
H3N2 वायरस क्या है
जुलाई, 2011 में इंसानों में पहली बार H3N2 वायरस की पहचान हुई थी। इससे पहले 2010 में ये सूअर पाए गए थे। यानी कि इस वायरस का शुरुआती करियर बना रहा है। साल 2012 में पहली बार इस वायरस की वजह से बड़े पैमाने पर लोगों के नाम सामने आए थे। एक बार फिर से अपने देश में इसके संक्रमण के मामले सामने आ रहे हैं। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के अनुसार, एच3एन2 वायरस इन्फ्लुएंजा-एक वायरस के परिवार से आता है, जो उत्परिवर्तन होता है। मानदंड का मानना है कि यह वायरस हर साल थोड़ा-थोड़ा बदलता है, जिसे एंटीजेनिक ड्रिफ्ट के रूप में जाना जाता है। यही वजह है कि इस वायरस के खिलाफ बनी इम्यूनिटी को चकमा देकर एच3एन2 वायरस इंसान के शरीर को अपनी चपेट में ले लेता है।
यह वायरस कैसे सामान्यीकृत है
यह दूसरे व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के संपर्क में आने से संबद्ध है। छींकने-खांसने की स्थिति में लोगों के मुंह या नाक से निकलने वाले के माध्यम से बूंदों के माध्यम से यह जुड़ता है। उसी हाथ से सरफेस को छूने के बाद उसी हाथ से अपने मुंह या नाक को छूने से यह आपको चिन्हित कर सकता है।
इसे आम वायरल फ्लू न समझें
काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च के अनुसार, कमजोर प्रतिरक्षा वाले लोग खासकर बच्चे, बड़े और पहले से बीमार लोगों को इस वायरस से ज्यादा खतरा है। ऐसे में बड़े, बच्चे और पहले से बीमार लोगों में अभी बुखार, सर्दी-खांसी आदि फ्लू के कोई भी लक्षण नहीं दिखते हैं, तो वह बिल्कुल भी अनदेखी न करें। 50 साल से ज्यादा और पांच साल से कम उम्र के लोगों में इस तरह के लक्षण ज्यादा देखने को मिल सकते हैं। स्कूल जाने वाले बच्चे भी इस इन्फ्लुएंजा की चपेट में आ सकते हैं। झलक, व हृदय रोग से जूझ रहे रोमांटिक में यह पक्का संक्रमण हो सकता है। वीडियो के अनुसार, यह कोरोना की तरह भीड़-भाड़ जगहों में आसानी से लोगों को अपना शिकार बनाता है। ऐसे में सबसे पहले समय मास्क लगाने में रहने में ही समझदारी है।
सात दिनों तक रह सकता है
विशेषज्ञों के मुताबिक 10 से 15 साल के बुजुर्गों में ही इस वायरस का संक्रमण खतरनाक है। वहीं, ज्यादातर में इसके लक्षण ही लक्षण हैं। हालांकि, सामान्य इन्फ्लुएंजा संक्रमण की तुलना में एच3एन2 के संक्रमण से गंभीर लक्षण विकसित हो सकते हैं। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन का मानना है कि संक्रमण के लक्षण पांच से सात दिनों तक बने रह सकते हैं। H3N2 से होने वाला बुखार आमतौर पर तीन दिनों में उतर जाता है, लेकिन खांसी के लक्षण तीन हफ्ते तक भी बने रह सकते हैं।
इन प्रतिक्रियाओं से मजबूत होगी प्रतिरक्षण
तरल पदार्थों का सेवन : स्थिर रहने से शरीर को संक्रमण से लड़ने की शक्तियाँ मिल जाती हैं। इसके लिए पानी, जूस, नारियल पानी और सूप लें। हानिकारक पदार्थ, सोडा और कॉफी जैसे पेय पदार्थों से बचें। पेसे नहीं चलने पर भी पानी पीते रहें।
क्रिसमस का दावा करें : विटामिन सी से भरपूर फल और अनियंत्रित आपके एक्टिव सिस्टम को सक्रिय करते हैं। आंवला, संतरा, नीबू जैसी चीजों का बहुत महत्व है।
नमक-पानी से करें गरारा : गले में दवा हो तो नमक के पानी से गरारे करने से ऊपरी श्वसन संक्रमण को रोकने में मदद मिल सकती है।
एंटीबायोटिक के इस्तेमाल से बचें
एम्स के पूर्व निदेशक डॉ रणदीप गुलेरिया ने डॉक्टर की सलाह के बिना अपने दिमाग से कोई एंटीबायोटिक नहीं लेने की सलाह दी है। दरअसल, एंटीबायोटिक सिर्फ जीवाणु संक्रमण में सम्मिलित होते हैं। वहीं, आइमा डॉक्टर भी सलाह देते हुए कहते हैं कि संदिग्ध फ्लू के रोगियों को एंटीबायोटिक दवाओं से परहेज करें। यह शरीर में एंटीबायोटिक प्रतिरोध पैदा करता है।
फ्लू वैक्सीन से बचाव होगा
H3N2 वायरस से बचाव में फ़्लू का टीका काफी हद तक हानिकारक हो सकता है। फ्लू वैक्सीन शरीर में एंटीबॉडी बनाता है, जो संबंध फ्लू से बचाव करता है। कामगारों पर कमजोर प्रतिरक्षण और बच्चों व दादा को टीके की अनिवार्य रूप से निगरानी की जानी चाहिए। यह टीका हर साल लगवाया जा सकता है। छह महीने से ज्यादा उम्र के बच्चे से रोड़ तक सभी टीके लगवा सकते हैं।
बच्चों के रखें खास ख्याल
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बच्चे को बुखार है और साथ में रैशेज या लूज मोशन आदि लक्षण हैं, तो तुरंत डॉक्टर को दिखाएं।
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बच्चे को भीड़-भाड़ वाली जगह न परमाणु और उनकी सफाई का पूरा ध्यान रखें। साथ ही साथ रेडियोधर्मी भोजन खातें।
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इस समय आप बच्चे को विटामिन-सी युक्त फल फ्रीज फल खाने को दें, लेकिन यदि खांसी हो तो इससे बचें।
एच3एन2 से बचाव के लिए
इन बातों का ध्यान रखें
वायरल संक्रमण से बचने के लिए बाहर से आने वाले अपने हाथों को हैंडवॉश से अच्छी तरह से प्रतीक्षा करें। भोजन से पहले भी हाथों की सफाई का ध्यान अवश्य रखें।
घर में किसी को बुखार, सर्दी, खांसी होने पर उनसे दूरी बनाएं। करीब जाने की स्थिति में मास्क का प्रयोग करें।
अगर आपको भी सर्दी, खांसी व बुखार जैसे लक्षण दिखते हैं तो सतर्क हो जाएं, ऐसे में घर पर रहें और आराम करें।
छींकते-खांसते समय मुंह और नाक को नैपकीन, रुमाल आदि से ठीक लें।
अपने हाथों से बार-बार आंख, नाक या मुंह को छूने से बचें।
भीड़भाड़ वाली जगहों पर समय पर जाते समय मास्क का इस्तेमाल जरूर करें।
नमक की बड़ी मात्रा चुपके से ले रहा लोगों की जान
पिछले दिनों विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूडब्ल्यूएस पोर्टफोलियो) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अगर नमक का संतुलित तरीके से इस्तेमाल किया जाए तो लाखों लोगों की जान बचाई जा सकती है। सूचकांक आंकड़ों के अनुसार, एक भारतीय औसत 10 ग्राम से अधिक नमक का उपयोग एक दिन में करता है। इसका प्रभाव हानिकारक है, उससे डबल. यह शरीर के लिए साइलेंट किलर की तरह काम करता है।
नमक के सेवन को लेकर रिपोर्ट की झलकियों की रिपोर्ट के अनुसार, भारत सहित अन्य विकसित देशों के लोग शरीर के लिए बड़ी मात्रा से अधिक नमक का उपयोग कर रहे हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि विकसित देशों में प्रतिदिन नमक की आदत में सुधार होता है, जिससे हृदय रोग जैसी बीमारियों के शिकार हो रहे हैं।
मात्रा में संतुलित मात्रा में जाना चाहिए
नमक यानी सोडियम, एक आवश्यक पोषक तत्व है। इसकी अधिक मात्रा में भोजन से हृदय रोग, आघात और समय से पहले मृत्यु का खतरा बढ़ जाता है। हमारे शरीर के लिए सोडियम का मुख्य स्रोत टेबल है। रिपोर्ट से पता चलता है कि दुनिया की केवल तीन प्रतिशत स्थिति वीडियो को कम करने के लिए जरूरी से सुरक्षित है और 73 प्रतिशत शर्मनाक सदस्य देशों में ऐसा चिपका ही नहीं जाता है। सोडियम को कम करने की कुंजी को लागू करने से 2030 तक दुनिया भर में लगभग 70 लाख लोगों की जान बचाई जा सकती है।
ज्यादा नमक का शरीर पर असर
आमतौर पर सोडियम को किडनी ब्लड से छानकर निकाल देता है, लेकिन जब इसकी क्षमता से ज्यादा सोडियम ब्लड में आता है तो किडनी इसे छानने में असमर्थ हो जाता है। सोडियम के सागर होने से शरीर को अतिरिक्त पानी की आवश्यकता होती है। रक्त से सोडियम को निकालने के लिए हृदय को अत्यधिक दबाव से काम करना पड़ता है। इस कारण ब्लड प्रेशर हाई हो जाता है, जिससे हार्ट अटैक, दुर्घटना का खतरा बढ़ जाता है।
भुवनेश्वर की बहु-विशिष्ट विविधता की सूची में पहला स्थान सामने आया
पिछले दिनों टाइम्स ऑफ इंडिया द्वारा आयोजित इंडिया मल्टी-स्पेशियलिटी हॉस्पिटल्स रैंकिंग सर्वे, 2023 में भुवनेश्वर शहर के इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल प्रोजेक्ट्स (आईएमएस) वीयूएम हॉस्पिटल ने मल्टी-स्पेशियलिटी हॉस्पिटल्स में अपना शीर्ष स्थान बनाए रखा है। वहीं, पूरे पूर्वी क्षेत्र में 250 एमबीबीएस वाले शिक्षण संस्थान एम्स और एसयूएम अस्पताल को तीसरा सर्वश्रेष्ठ मल्टी-स्पेशियलिटी अस्पताल का स्तर दिया गया है। खास बात यह है कि इस मेडिकल कॉलेज और अस्पताल के सभी सुपरस्पेशियलिटी लेटर में एमसीएच व एमएस प्रोग्राम के अलावा कुछ विशिष्ट विषयों में चुने पाठ्यक्रम भी हैं। इस मेडिकल कॉलेज सह अस्पताल को वर्ष 2022 के राष्ट्रीय सिंक रैंकिंग (एनआइ रैंकिंग) में 18वें स्थान पर रखा गया था। एसयूएम को अल्टीमेट मेडिकेयर के मामले में भी नंबर एक स्थान दिया गया है।
1600 बेड की क्षमता वाला अस्पताल
गैर-मान्यता प्राप्त 1600 बेड वाले एम्स और एसयूएम अस्पताल, बड़ी संख्या में अनुभवी डॉक्टर और सुपर स्पेशलिटी प्राप्त करने वालों के साथ नए चिकित्सा देखभाल प्रदाता प्रदान करते हैं। यह ओडिशा का पहला अस्पताल है, जिसने अस्थि रोग के मामलों के लिए बोन मैरो ट्रांसप्लांटेशन, लिवर ट्रांसप्लांटेशन और रोबोटिक सर्जरी जैसे झटके को पूरा किया है। इस अस्पताल में इलाज के लिए आने वाले लगभग 70 प्रतिशत रोगियों की स्थिति बीजू स्वास्थ्य कल्याण योजना के तहत मुफ्त इलाज भी किया जाता है। इसके अलावा अस्पताल के विभिन्न विवरण, जैसे- नेफ्रोलॉजी, कार्ड साइंस, मेडिकल ऑन्कोलॉजी, आदि में न्यूनतम लागत पर परामर्श किया जाता है।
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