बिलासपुर-पेंड्रा:बीच करीब 5 किमीदूर डाउन लाइन पर 115 साल पुराने भनवारटंक सुरंग की मियाद खत्म,पुरानी दीवारों उखड़ा प्लास्टर, अब 10 की स्पीड से गुजार रहे ट्रेनें

रायपुर से कटनी यानी उत्तर भारत जाने वाली ट्रेनों के सबसे पुराने रूट पर बिलासपुर से पेंड्रा के बीच ऊंची पहाड़ियां और बेहद घना जंगल है। इस रेलवे ट्रैक पर भनवारटंक स्टेशन से करीब 5 किमी दूर डाउन लाइन पर 115 साल पहले बनाई गई बेहद महत्वपूर्ण और प्रदेश की सबसे ऊंचाई पर बनी 331 मीटर लंबी सुरंग अब दरकने लगी है। ईंटों से बनी सुरंग की दीवारों में दरारें पड़ रही हैं, प्लास्टर उखड़कर गिरने लगा है।
कई जगह पुरानी ईंटे घुलने लगी हैं। पुरानी होने की वजह से इस सुरंग का आकार भी नए एलएचबी कोच के लिए पर्याप्त नहीं है। जर्जर होने की वजह से रेलवे इस सुरंग से ट्रेनों को 10-15 किमी प्रतिघंटे की स्पीड से गुजारने लगा है, ताकि कोई खतरा न हो।
सुरंग डाउन लाइन पर है और इससे निकलते ही ठीक सामने 500 मीटर पर गहरी खाई है। मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश और बिहार से बिलासपुर की ओर आने वाली सभी ट्रेनें इसी सुरंग से गुजरती हैं। अफसरों के मुताबिक इस खाई पर बना ब्रिज भी बिलासपुर जोन (समूचे छत्तीसगढ़) का सबसे ऊंचा है। यह अभी मजबूत है। सुरंग की मियाद ज्यादा से ज्यादा सौ साल हो सकती है, लेकिन यह भी खत्म हो चुकी है। रेलवे का इंजीनियरिंग विभाग इस सुरंग के भीतर दो-तीन जगह सीमेंट की पिचिंग कर चुका है। अफसरों ने ही माना दीवारें भले ही मजबूत लगती हैं, सुरंग की ईंटें घुलने लगी हैं। 115 साल पहले बनी इस सुरंग का डिजाइन गोल और बड़े पाइप जैसा है। गोलाई उस समय चल रही ट्रेनों के इंजन और बोगियों के हिसाब से बनाई गई होंगी। अब हाई टेक्निक एलएचबी कोच अा गए हैं। ये डोलने पर सुरंग की दीवारों से रगड़ खाने लगे हैं। इसलिए भी ट्रेनों को 10 की स्पीड से गुजारा जा रहा है, ताकि कोच यदि रगड़ भी खाएं तो नुकसान न हो। इन सुरंग में हैलोजन लाइट्स के लिए लगाए गए केबल जगह-जगह से खुले हुए हैं। कोच के सुरंग की दीवारों से टकराने का एक खतरा यह भी है कि यदि कोच टकराकर खुले तार के संपर्क में आए तो करंट भी फैल सकता है। इस सुरंग के बीचोबीच पटरी के किनारे पानी का एक कुंड है। इसमें पहाड़ का पानी रिसकर भरता रहता है। सुरंग के आसपास रहने वाले गैंगमैन इसका उपयोग करते हैं। उन्होंने बताया यह पानी हमेशा ताजा और साफ रहता है।लाइन दोहरीकरण के दौरान 1966 में यहीं अप लाइन पर दूसरी सुरंग बनाई गई। इसकी उम्र पुरानी सुरंग से 59 साल कम है और लंबाई 109 मीटर ज्यादा (कुल 441 मीटर) है। नई सुरंग इतनी सीधी है कि आरपार दिखता है।लाइन दोहरीकरण के दौरान 1966 में यहीं अप लाइन पर दूसरी सुरंग बनाई गई। इसकी उम्र पुरानी सुरंग से 59 साल कम है और लंबाई 109 मीटर ज्यादा (कुल 441 मीटर) है। नई सुरंग इतनी सीधी है कि आरपार दिखता है।
1. सुरंग का द्वार। 2. दीवारों पर लगी ईंटें घुलने लगी हैं। 3. सुरंग की दीवारों पर नजर आ रहे हैं एलएचबी कोच टकराने के निशान।



