जशपुर जिला

ऐसी भी पाठशाला:दो शिक्षकों वाले स्कूल में 3 साल से एक भी छात्र नहीं, अभिभावक बोले-नहीं होती सरकारी में पढ़ाई

  • 6 किमी दूर चलकर जाते हैं प्राइमरी के छात्र

चौंकिए मत, जाहिर है हर कोई यही सोचेगा कि बिना छात्र-छत्राओं के स्कूल कैसा। ये स्कूल कोई और नहीं बल्कि फरसाबहार विकास खंड के भितघरा गांव का प्राथमिक शाला हैं। स्कूल में आज भी दो शिक्षकाें, एक रसोइया, एक सफाई कर्मी की तैनाती है लेकिन छात्र एक भी नहीं है। लोग अपने बच्चों का यहां पर दाखिला नहीं कराते हैं। इसके पीछे का कारण भी चौंकाने वाला है।

इस गांव के अभिभावकों का मानना है कि सरकारी स्कूल में पढ़ाई नहीं होती है। हालांकि भास्कर टीम ने उनसे इससे संबंधित पुख्ता सबूत की मांग की तो उन्होंने इसकी मौजूदगी न होना बताया, फिर भी यह धारणा उनमें विकसित है। साथ ही गांव के कुछ अभिभावकों से बात की गई तो उन्होंने बताया कि वह चाहते हैं कि उनके बच्चे अच्छी शिक्षा पाएं, इसके लिए अपने बच्चों को गांव से 6 किमी दूर तामामुंडा के मिशन स्कूल भेजते हैं। पिछले तीन सालों से इस स्कूल में एक भी बच्चे पढ़ने के लिए नहीं पहुंचा। इतना ही नहीं स्कूल का एडमिशन रजिस्टर भी तीन साल से नहीं खुला क्योंकि किसी ने दाखिला ही नहीं कराया। साथ ही तीन वर्ष पहले जो छात्र-छात्राएं यहां पढ़ रहे थे, उन्होंने भी अपने नाम यहां से कटा लिए हैं।

ज्ञान की जगह महामारी रोकथाम में योगदान दे रहे गुरुजी
इस गांव में पदस्थ दो शिक्षकों में से शिक्षक सिंधु पैंकरा को केरवारोज के स्कूल में अटैच कर दिया गया है। वहीं शिक्षक मदन कुमार पैंकरा कोरोना कंट्रोल रूम में ड्यूटी कर रहे हैं। शिक्षक मदन ही सामान्य दिनों में स्कूल खोलते हैं और जब किसी स्कूल में शिक्षक की जरूरत होती है तो इन्हें बीईओ के निर्देश पर उस स्कूल में जाना होता है।

2012 से कम होने लगे, 2017 में एडमिशन शून्य
वैसे प्राथमिक शाला भितघरा में बच्चों की कम दर्ज संख्या का सिलसिला बीते 12 सालों से चला आ रहा है। वर्ष 2009 में इस स्कूल में कक्षा पहली में 7, दूसरी में 3 और तीसरी में 1 बच्चे थे। वर्ष 2009 में सबसे अधिक दर्ज संख्या 11 बच्चों की रही। इसके बाद से इस स्कूल में बच्चे आए भी तो पहली व दूसरी तक ही पढ़े। अंतिम बार इस स्कूल में वर्ष 2012 में दो बच्चे बृजकुमार और कृष्ण कुमार ने 5वीं पास किया था। पर यह दोनों बच्चे भी भितघरा के नहीं बल्कि नजदीक गांव बनगांव के थे। इस स्कूल में अंतिम बार पांचवीं पास कर निकले बृजकुमार और कृष्ण कुमार दोनों भाई हैं जो अब गोवा में रहते हैं। वहां वे मजदूरी करते हैं। अंतिम बार वर्ष 2017 में इस स्कूल में कक्षा पहली में 1 और दूसरी में 3 बच्चे थे।

दूरी के जरूरी होने का दावा दिखा सच
भास्कर टीम यहीं नहीं रुकी आगे की पड़ताल करने के लिए शाम 5 बजने का इंतजार किया गया। गांव के दर्जन भर से अधिक मासूम बच्चे, जो 3,4,5 कक्षा के छात्र-छात्राएं हैं, किनारे के रास्ते पर आते मिल गए, इसका सबसे अहम पहलू ये रहा कि ये बच्चे 6 किमी की दूरी पैदल ही तय करके तामांमुंडा के मिशन स्कूल से घर लौट रहे थे।

शिक्षक बोले, समझाया अब अधिकारी करें पहल
स्कूल में पदस्थ शिक्षक मदन कुमार पैंकरा ने बताया कि उन्होंने कई बार पालकों की बैठक कर बच्चों को गांव के स्कूल में भेजने की बात कही है। पर अभिभावक बच्चों को मिशन में पढ़ाना ज्यादा पसंद करते हैं। यह स्कूल फरसाबहार ब्लॉक मुख्यालय से महज 3 किलो मीटर की दूरी पर है।

पढ़ाई नहीं होती
इस गांव की महिला पंच अंशु तिर्की का कहना है कि स्कूल में पढ़ाई नहीं होती है इसलिए गांव के सभी बच्चों को मिशन स्कूल में भेज रहे हैं। सभी को बच्चों के भविष्य की चिंता है। इधर शिक्षक मदन पैंकरा ने बताया कि उन्हें भी अच्छा नहीं लगता है कि गांव में स्कूल होते हुए बच्चे इतनी दूर पढ़ाई लिए जाते हैं। उनकी ओर से कई प्रयास हुए पर अभिभावक राजी नहीं हुए।

बच्चों के भरोसे बैठे अधिकारी
ऐसे स्कूलों में पदस्थ शिक्षकों को दूसरे स्कूलों में अचैट कर दिया जाता है। जब स्कूल में बच्चे आ जाएंगे तो फिर से शिक्षक वहीं जाकर ड्यूटी करेंगे। भितघरा में पदस्थ दोनों शिक्षक दूसरी जगह ड्यूटी पर लगाए गए हैं। शून्य दर्ज संख्या के बावजूद स्कूल बना रहेगा।
-एसएन पंडा, डीईओ, जशपुर।

Related Articles

Back to top button