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हाईकोर्ट का फैसला, पुनर्विवाह के बाद विधवा महिला खो सकती है संपत्ति का अधिकार

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

रायपुर 5 जुलाई |पति की मौत के बाद उसकी सारी सपंत्ति पर अधिकार पत्नी का हो जाता है। ऐसे में अगर विधवा महिला पुनर्विवाह करती है तो वह पति की संपत्ति पर अपना अधिकार खो सकती है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 28 जून को इसे लेकर एक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि यह भी कहा है कि इसे तब तक स्थापित नहीं कहा जा सकता, जब तक कि कानूनी प्रक्रियाओं के तहत यह सख्ती से साबित न हो।

जस्टिस संजय अग्रवाल की पीठ ने 28 जून को अपने आदेश में कहा है कि एक वैध पुनर्विवाह के बाद विधवा अपने पूर्व पति से विरासत में मिली संपत्ति पर अपना अधिकार खो देगी। ऐसा तब होगा जब पुनर्विवाह के तथ्य को सख्ती से साबित किया जाता है। जस्टिस संजय अग्रवाल ने अपने फैसले में कहा कि हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम 1856 की धारा छह के अनुसार, पुनर्विवाह को स्थापित नहीं कहा जा सकता है, जिससे संपत्ति का अधिकार, जो एक संवैधानिक अधिकार है, खो जाता है, वह भी एक विधवा का।

हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 1856 की धारा छह में कहा गया है कि विवाह को वैध बनाने वाले सभी समारोहों और संस्कारों का विधवा के पुनर्विवाह पर समान ‘कानूनी प्रभाव’ होगा। इसके अतिरिक्त, अधिनियम की धारा दो में कहा गया है कि एक विधवा के अपने मृत पति की संपत्ति पर उसके विवाह पर अधिकार समाप्त हो जाएगा।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने विधवा के खिलाफ उसके पति के चचेरे भाई की तरफ से दायर एक मुकदमे को खारिज कर दिया, जिसमें दावा किया गया था कि उसने एक स्थानीय अनुष्ठान में पुनर्विवाह किया था, जिसमें एक व्यक्ति ने उसे चूड़ियां दी थीं और इसलिए पारिवारिक सपंत्ति पर उसका कोई दावा नहीं था। विवाद के केंद्र में संपत्ति मूल रूप से सुग्रीव नाम के एक शख्स की थी, जिसके चार बेटे मोहन, अभिराम, गोवर्धन और जीवनवर्धन थे। मोहन का कोई संतान नहीं था, गोवर्धन का एक पुत्र लोकनाथ था। अभिराम का एक पुत्र घासी था, जिसकी मौत 1942 में हो गई थी।

पूरा मामला घासी की संपत्ति के हिस्से के इर्द-गिर्द केंद्रित था। मृतक लोकनाथ ने ही कोर्ट का रुख किया था, उसने यह तर्क दिया था कि घासी की विधवा कीया बाई ने 1954-55 में ‘चूड़ी अनुष्ठान’ के माध्यम से दूसरी शादी की थी, इसलिए उसने संपत्ति में कोई दिलचस्पी नहीं रखी। वहीं, छत्तीसगढ़ी समाज के कुछ वर्गों में पहले यह प्रथा थी कि यदि कोई पुरुष अविवाहित महिला या विधवा को चूड़ियां देता है, तो उसे विवाह माना जाता था।

वहीं, वादी का विरोध करते हुए कीया बाई और उनकी बेटी ने एक संयुक्त बयान दाखिल किया कि तहसीलदार ने 1984 में कानून के अनुसार राजस्व रेकॉर्ड में उनके नाम दर्ज किए थे और इसमें कोई अवैधता नहीं है। उन्होंने कहा कि कीया ने कभी दोबारा शादी नहीं की और दीवानी मुकदमे को खारिज कर दिया जाना चाहिए। ट्रायल कोर्ट ने आंशिक रूप से वाद का फैसला किया।

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