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आपातकाल की बरसी में कांग्रेस पर जमकर बरसे विजय बघेल, पढ़िए उन्होंने क्या कहा..

कवर्धा, 25 जून । कवर्धा जिला भाजपा कार्यलय में सांसद विजय बघेल ,महामंत्री क्रांति गुप्ता,वीरेंद्र साहू राजेन्द्र चंद्रवंशी उपाध्यक्ष,अजीत चंद्रवंशी कोषाध्यक्ष,जसविंदर बग्गा उपाध्यक्ष,बसन्त नामदेव सोसल मीडिया प्रभारी,पीयूष सिंह,चंद्रप्रकाश चंद्रवंशी आपातकाल,काला दिवस के कार्यक्रम में उपस्थित रहे। दुर्ग सांसद विजय बघेल ने प्रेस वार्ता में बताया कि 1975 से 1977 तक का 21 महीने की अवधि मे भारत मे आपातकाल घोषित था । तत्कालीन राष्ट्रपति फाखरूद्दीन आली अहमद ने तब के प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के कहने पर भारतीय संविधान की धारा 352 के अधीन आपातकाल लगा दिया था । स्वतंत्र भारत के इतिहास मे यह सबसे अलोकतांत्रिक काल था । आपातकाल मे चुनाव स्थगित हो गए तथा नागरिक अधिकारों को समाप्त करके मनमानी की गई । लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने इसे ‘भारतीय इतिहास की सर्वाधिक काली अवधि ‘ कहा था ।

श्रीमती इन्दिरा गांधी की ताना मे भर देश खिलाफ के अनियमितता तमाम ऍवं भ्रष्टाचार तब भयंकर आक्रोश था । विगत चुनाव मे इन्दिरा गांधी के प्रतिद्वंदी रहे राजनारायण जी की चुनाव याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट दवारा श्रीमती इन्दिरा गांधी के खिलाफ फैसला देने पर उनके हाथ से सत्ता निकलती दिखी और तब 25 जून 1975 की रात को राष्ट्रपति फाखरूद्दीन आली अहमद ने प्रधानमंत्री की सलाह पर उस मसौदे पर मुहर लगते हुए देश मे संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल घोषित कर दिया । लोकतंत्र को निलंबित कर दिया । आपातकाल की घोषणा होते ही स्वयंसेवको और तमाम गैर कांग्रेसी नेताओ की गिरफ़्तारी शुरू हो गयी । उन पर प्रताड़नाओ का सिलसिला सा चल पड़ा । लोकनारायां जयप्रकाश नारायण , मोरार जी भाई देसाई , अटल बिहारी वाजपेयी , लालकृष्ण आडवाणी , के संविधान , जेटली अरुण , मलकनी और जार्ज फर्नांडीस , नीतीश कुमार , सुशील मोदी रामबिलाष पासवान , शरद यादव , रामबहादुर राय समेत हजारों लोग गिरफ्तार कर लिए गए थे । अविभाजित मध्यप्रदेश से भी नेता गिरफ्तार कर लिए गए थे ।

हम सब जानते है की भारत मे एक सदी भर लंबे संघर्षों और हजारों हुतात्माओ के बलिदान के बाद हमने आजादी पाई है । आजादी उपरांत संविधान सभा के अध्यक्ष डाँ के संविधान और राजेन्द्र मे रूप के निर्माता संविधान हम जिन्हे भीमराव अंबेडकर स्व अध्यक्ष के समिति प्रारूप जानते हैं , दिया उपहार यह का ‘लोकतंत्र’ हमे ने । बड़े ही त्याग और बलिदान से प्राप्त इस लोकतंत्र को काँग्रेस नेत्री तब की प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने आधी रात को खत्म कर देश को फिर से तानाशाही और गुलामी के उसी बियाबान मे ढकेल दिया था मे 1947 कर निकाल से जहां , भारत वापस आया था ।

दशकों से हमे ‘ सेक्युलरिज्म और सोशलिज़्म ‘ जैसे शब्दों से डराने की कोशिश की जाति थी । जबकि तथ्य यह है की ये दोनों शब्द आपातकाल से पहले हमारे संविधान का हिस्सा थे ही नहीं । आपातकाल मे जब सारी ताकते केवल एक ही व्यक्ति मे केंद्रित कर डी गयी थी । राष्ट्रपति , नगरपालिका , सांसद समेत सभी संवैधानिक निकाय निष्प्रभावी कर दीये गए थे , तब ‘ पंथनिरपेक्षता ‘ और ‘समाजवाद ‘ इन दोनों शब्दों को संविधान के प्रस्ताव मे चुपके से डाल दिए गए थे

यह खासकर याद रखना होगा कि आपातकाल के दौरान अभिव्यक्ति की आजादी को भी बुरी कुचल दिया गया था । मीडिया पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाया गया था । इमरजेंसी लगाने के तुरंत बाद अखबारों की दफ्तरों की बिजली कट डी गयी , ताकि ज्यादातर अखबार अगले दिन आपातकाल का समाचार न छाप सके । आपातकाल के दौरान 3801 अखबारों को जब्त किया गया । 327 पत्रकारों को मिसा कानून के तहत जेल मे बंद कर दिया गया । 290 अखबारों मे सरकारी वज्ञापन बंद कर दिए गए । ब्रिटेन के The Times और THE Guadian जैसे कई समाचार पत्रों के 7 संवाददाताओ को भारत से निकाल दिया गया । रायटर्स सहित कई कीदेशी न्यूज एजेंसीयो के टेलीफोन और दूसरी सुविधाये काट दी गई । 51 विदेशी पत्रकारों की मान्यता छिन लि गई। 29 विदेशी पत्रकारों को भारत मे एंट्री देने से मना कर दिया गया । छतीसगढ़ समेत जी मुट्ठी भर प्रदेशों मे कांग्रेस या उसके प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष समर्पित दलों का शासन है , वहाँ क्या हो रहा है , देख लीजिए । महाराष्ट्र मे किस तरह से असहमति के करण अभएनेत्री का घर ढाह दिया जटा है , पत्रकारों से कैसा सलूक होता है । पालघर के साधुओ को भीड़ दवारा लिंच कर देने की खबर दिखने के करण अर्णव गोस्वामी उनकी टीम की साथ कांग्रेस समर्पित सरकार ने वहाँ कैसा बर्बर अत्याचार किया , यह उदाहरण सामने है , ये तमाम चीजे महज संयोग बल्कि प्रयोग है । यही आपातकाल वाली कांग्रेस की मूल वृत्ती है । आप पश्चिम बंगाल का उदाहरण देख लीजिए । कांग्रेस कम्युनिटी के प्रत्यक्ष समर्थन से चुन कर आई सरकार सत्ता मे आते ही कार्यकर्ताओ दवारा किस नृशंस तरीके से हत्या , बलात्कार और लूट आदि को अंजाम दे रही है । वास्तव मे ऐसे तमाम उदाहरण आपातकाल जैसी मनोवृत्ति के ही है ।

प्रदेश की अभी की कांग्रेस सरकार का उदाहरण तो सबसे नया और अनूठा है जहां किसी टविट को रीट्वीट तक करना बडा अपराध बना दिया जाता है । जहां शासन के संसाधनों और समय का पूरा उपयोग भाजपा प्रवक्ता की आवाज को पुलिसिया डर दिखा कर दबाने , राष्ट्रीय पत्रकारों पर सौ सौ मुकदमे दर्ज करने मे लगा दिया जाता है । जहां कांग्रेस के कार्यकर्ता दवारा पुलिस स्टेशन के सामने ही पत्रकारों से बर्बरता से हिंसा की जाती है , महज इसलिए क्योंकि वाह आपसे असहमत है और आप वैसे ही उनकी अभिव्यक्ति की आजादी को खत्म करना चाहते है जैसा इन्दिरा गांधी जी ने किया था । आपातकाल के संदर्भ मे एक खास बात हमे बार बार स्मरण रखने की है कि आज 2021 मे हम जिस आजादी की हवा मे सांस ले रहे है , यह आजादी हमने कांग्रेस से लड़ हासिल की है । फिरंगियों अंग्रेजों से गांधी सुभाष के नेतृत्व मे लड़ कर हमे जो आजादी मिली थी , वाह 1975 मे हमने खो दी थी । कांग्रेस ने वह आजादी हमसे छिन ली थी । यह दूसरी आजादी हमने कांग्रेस से लड़ कर पाई है , कांग्रेस ने अपनी आजादी की विरासत को तब ही खत्म कर दिया था । भारतीय संविधान और लोकतंत्र आज के भाजपा (तब का भारतीय संघ ) के इतिहास पुरुष अटल – आडवाणी – नानाजी जैसे राष्ट्रवादी का हासिल किया लोकतंत्र है । लोकनायक जयप्रकाश नारायण का कमाया लोकतंत्र है यह जिस का आज हम आनंद ले रहे है । आज का लोकतंत्र कांग्रेस के कारण नहीं बल्कि उसके बावजूद कायम है ।

दुर्ग सांसद विजय बघेल ,कवर्धा प्रेस वार्ता में पहुंचे

बात चाहे इस आपातकाल की हो या पहली आजादी के बाद देश की विभाजन की , या उसके बाद भी लगातार यह साबित किया है की भारतीय लोकतंत्र के पवित्र शब्दों का भारत के लोगों दवारा आत्मसमर्पित भारत के संविधान की आत्मा का , देश की एकता और अखंडता का कांग्रेस के लिए तब कोई महत्व नहीं रहता है जब उसकी सत्ता नहीं हो या जाने वाली हो । बांटो और अर्ज करो की विभाजनकारी सिद्धांत हमेशा ही कांग्रेस , खासकर नेहरू परिवार का मूल मंत्र रहा है ।

हमने अपने पुरखों के बलिदान से भले आजादी दुबारा हासिल करने मे सफलता पाई हो , लेकिन इस आजादी पर खतरे हमेशा बने रहेंगे , जब तक कांग्रेस कायम है । आपातकाल भले 1977 मे खत्म हो गया लेकिन , आपातकाल की मनोवृत्ति वाले तत्व और संगठन आज भी मौजूद है , हर क्षण – प्रतिपाल लोकतंत्र विरोधी तत्वों के खतरे के प्रति सावधान रहने की जरूरत है । अगर आप इतिहास को याद नहीं रखेंगे तो उसे बार बार दुहराने पर विवास होंगे । आपातकाल का यह इतिहास हमे इसलिए भी बार बार हर बार स्मरण रखन चाहिए ताकि ऐसा कलंकित इतिहास काभी अब फिर दुहराने का दुस्साहस कांग्रेस या उस मनोवृत्ति वाला कोई डाल कही अब करने मे सफल नहीं हो पाए । सत्ता के मैड मे चूर होकर कांग्रेस या ऐसा कोई दल फिर से इस भयानक इतिहास को दुहराने का साहस नहीं कर पाए , इस लिए हमेशा सचेत रहने की जरूरत है ।

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