छत्तीसगढ़ विशेषराजनांदगांव जिलास्वास्थ्य

छत्तीसगढ़ की लचर व्यवस्था..जिला अस्‍पताल के प्रबंधन ने ली जान…बेटी ने अस्‍पताल में खुद ऑक्‍सीजन सिलेंडर पहुंचाया.. पिता को बचाने की गुहार लगाती रही.. फिर सुबकते हुए फोन पर बताया.. पापा नहीं रहे…

प्रदीप बेग बने एक और मौत के जिम्‍मेदार

राजनांदगांव। बेबस मायूस एक बेटी की हजार कोशिशों के बाद मेडिकल कॉलेज संबंद्ध जिला अस्‍पताल की लापरवाही ने एक पिता की जान ले ली। “उजागर” के पास उस बेटी का वह ऑडियो है जिसमें वह अपने पिता को बचाने की गुहार लगा रही है और इसके कुछ ही देर बाद वह बमुश्किल यह कह पा रही है कि उसके पिता नहीं रहे। इस ऑडियो को सुनने के बाद शायद ही लोग अपने गुस्‍से को रोक पाएं।

11 अप्रैल को बसंतपु‍र निवासी विष्‍णु साहू को जिला अस्‍पताल दाखिल किया गया था। उनका कोविड टेस्‍ट नेगेटिव था लेकिन सांस लेने में समस्‍या थी। ऑक्‍सीजन लेवल 70 तक गिर चुका था। डॉक्‍टरों ने उनका निमोनिया बढ़ने की बात कही थी। सांस लेने में तकलीफ के बावजूद उन्‍हें अस्‍पताल में ऑक्‍सीजन नहीं लगाया जा रहा था। अस्‍पताल में ऑक्‍सीजन उपलब्‍ध न होने की बात क‍ही जा रही थी। वे आईसीयू के बेड नं 104 में भर्ती थे। ऐसे में मरीज की बेटी निकिता ने खुद ही जहां-तहां से ऑक्‍सीजन सिलेंडर की व्‍यवस्‍था की। बावजूद इसके अस्‍पताल प्रबंधन मरीज को ऑक्‍सीजन देने में लापरवाही करता रहा। खबर है कि कुछ देर के लिए मरीज को वेंटिलेटर सपोर्ट पर भी रखा गया लेकिन इसे भी कुछ ही देर में हटा दिया गया।

13 अप्रैल को मरीज विष्‍णु साहू ने आखिर लचर व्‍यवस्‍था के सामने हार मानते हुए दम तोड़ दिया और एक बेटी की अपने पिता को बचाने की जद्दोजहद भारी निराशा और बेबसी के साथ खत्‍म हो गई। हालात यह रहे कि बेटी खुद ही अस्‍पताल के बाहर से अपने पिता के लिए ऑक्‍सीजन सिलेंडर की व्‍यवस्‍था करती रही। लेकिन सिर्फ और सिर्फ अस्‍पताल में मदद न मिल पाने की वजह से उसने अपने पिता को खो दिया। इस घटना के बाद से मृतक के परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है।

अब सवाल उठ रहा है कि एक परिवार से उसका मुखिया और बच्‍चों के सिर से पिता का साया छिनने वाले जिम्‍मेदारों का क्‍या! क्‍या जिला अस्‍पताल अब महज वह काल बनकर रह गया है जहां जीवन बचने-बचाने की संभावनाएं खत्‍म हो रही है। प्रबंधन के खिलाफ लगातार सवाल उठ रहे हैं। इस मामले का विडियो भी है जिसमें निकिता अपने पिता की ईलाज में लापरवाही की शिकायत सीधे अधीक्षक प्रदीप बेक से कर रही है। इस दौरान अधीक्षक उसे बेहतर ईलाज का आश्‍वासन देते हैं। निकिता जब सवाल करती है कि “अगर मेरे पापा को कुछ हुआ तो क्‍या आप जिम्‍मेदारी लेंगे?” इस सवाल के बाद अधीक्षक खामोश हो जाते हैं।

जब अधीक्षक से ईलाज में लापरवाही की शिकायत की गई थी तब ही उन्‍हें बताया गया था कि ऑक्‍सीजन सिलेंडर उपलब्‍ध करवाने के बाद भी मौजूद नर्स, स्‍टॉफ मरीज को ऑक्‍सीजन नहीं लगा रहे हैं। यह सिलसिला इस शिकायत के बाद भी चलता रहा। बिस्‍तर के पास ही रखे ऑक्‍सीजन मरीज को देने में भी न जाने क्‍यूं कोताही बरती गई।

इस निराशाजनक खबर के बाद अस्‍पताल प्रबंधन की लचरता की शिकायतों से आगे अब सवाल है कि आखिर क्‍यूं सत्‍ता, प्रशासन ऐसे कई मामलों के बाद भी कार्रवाई से हाथ पीछे खींच रहा है। शहर के जिम्‍मेदार जनप्रतिनिधि-नेता कहां हैं.. क्‍या वे सिर्फ निरीक्षण की तस्‍वीरें खींचवाने, सोशल मीडिया पर कोरोना के ज्ञान देने तक ही सीमित होकर रह गए हैं। अगर, अपने पिता को खो चुकी बेटी सामने आकर सवाल करने लगे तो शायद सब के मुंह सिल जाएं और उनके सिर झुकाने की नौबत आ जाए।

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