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बाघ की मौत पर वन विभाग का मौन ! संदेह के घेरे में पूरा मामला संगीन

वन विभाग अधिकारी की लापरवाही

ना जंगल की सुरक्षा, ना जानवरो की सुरक्षा!

जिले की कमान सँभालने वाले पर सवाल खड़े हुए हैं

कबीरधाम। जिले में विगत 11-12 नवंबर को हुए राष्ट्रीय जानवर बाघ की मौत पर संशय और संदेह के साए आज भी मंडरा रहे हैं। वन अधिकारी के तथ्यहीन बयान से मौत पर आशंका और भी गहरा रहा है। ज्ञात हो कि अफसर ने अपने सर्वप्रथम बयान में “दो बाघों के वर्चस्व की लड़ाई से एक बाघ की मौत का जिक्र किया था।” उसके दो-तीन दिवस बाद अधिकारी ने अपने दूसरे बयान में “बाघ की मौत को 5 दिन पुरानी मौत कहा। “ और यह भी कहा कि हो सकता है “यह प्राकृतिक मौत हो।”

सफाचट बात करें तो वन मंडल अधिकारी को यह नहीं पता कि बाघ की मौत कब हुई थी? बाघ की मौत किस कारण हुई? क्या बाघ की मौत हुई या बाघ की हत्या हुई? यह अधिकारी के संज्ञान में नहीं है। अर्थात बिना किसी सीसीटीवी फुटेज के अधिकारी के द्वारा यह कहना कि- “दो बाघों के वर्चस्व की लड़ाई में एक बाघ की मौत हुई है।” फिर दूसरे बयान में “पांच दिन पुरानी मौत बताया। “और यह भी कहा कि “प्राकृतिक मौत है। “अर्थात बिना जाने समझे बिना किसी पुख्ता सबूत के वन मंडल अधिकारी का अलग-अलग बयान लोगों के हलक से नहीं उतर रहा है। सबसे बड़ी बात यह कि प्रदेश कार्यालय को सूचना मिलते ही आला अधिकारी पूरे दलबल के साथ जिले के चिल्फी क्षेत्र में आमद देते हैं और आनन-फानन में राष्ट्रीय जानवर बाघ का पोस्टमार्टम किया जाता है जो ना ही किसी पत्रकार के संज्ञान में है और ना ही किसी पत्रकार को इस घटना की सूचना दी जाती है। चार साल के भीतर दो बाघ की मौत बेहद संदेह और आशंका को जन्म देता है।

          साफगोई बात करें तो राष्ट्रीय जानवर की सुरक्षा इस जिले में बिल्कुल ही नहीं है। पिछले कुछ सालों से बाघ सहित और अन्य जानवरों की मौत यहां निरंतर होती रही है। न ही अधिकारी यहां सचेत है और न ही विभागीय अमला सचेत है। करोड़ों रुपए का सरकारी आमद यहां पर भ्रष्टाचार और बंदरबांट में जाया हो रहे हैं जिसकी वजह से जानवरों की मौत हो रही है, वन खतम होते जा रहे है, पेड़ निर्बाध काटे जा रहे हैं। जिले के जंगल में जानवरों की हत्या हो रही है जो सर्व विदित है। 11-12 नवंबर को मरे बाघ की “मौत” को अधिकारी बहुत ही छोटे दर्जे पर ले रहे है। ना ही बाघ के शव और न तस्वीर दिखाया जा रहा है और ना ही बाघ के संदर्भ में कुछ उचित जानकारी दी जा रही है जरूरत तो यह थी कि राष्ट्रीय जानवर की मौत के पश्चात प्रेस वार्ता रखनी चाही थी जिससे संदेहास्पद हुई बाघ की मौत पर से पर्दा उठ सकता था किंतु अधिकारी ने प्रेस वार्ता ना रख अपने बयान को प्रेस विज्ञप्ति के जरिए एक-दो मीडिया तक ही सिमटा कर रखा। यह मामला बेहद ही संगीन, संदेहास्पद और संशय से भरा लग रहा है अर्थात उच्च स्तर पर जांच की जाए तो बाघ की “मौत” या हत्या पर से पर्दा उठ सकता है। 

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