रायपुर जिला

फर्जीवाड़ा:फर्जी तरीके से कॉलेजों में लिया एडमिशन,छात्र डॉक्टर भी बन गए, 2008 से 2011 तक दर्ज किए थे मामले

करीब 12 साल पहले प्री मेडिकल टेस्ट यानी पीएमटी में मुन्ना भाइयों की मदद से जो छह छात्र मेडिकल कॉलेज तक पहुंचे थे, उनमें पांच डॉक्टर बन गए हैं। इनमें 2008 बैच के केवल एक छात्र का ही एमबीबीएस करना बाकी है। यह छात्र फाइनल ईयर सेमेस्टर दो में पढ़ रहा है।

खुद की जगह दूसरे छात्रों को पीएमटी में बिठाकर परीक्षा पास करने के आरोप में उस समय सीआईडी ने 50 छात्रों का थंब इंप्रेशन भी लिया था। हालांकि इसमें किसी भी छात्र पर आरोप साबित नहीं हो पाया। इन्हीं में शामिल 6 छात्रों ने गिरफ्तारी से बचने हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत भी लगाई थी। बाद में कोर्ट ने सभी को मेडिकल कॉलेज में पढ़ने की अनुमति दे दी थी।                                                                                                         प्रदेश में पहली बार मुन्नाभाई के सहारे पीएमटी पास करने वाली छात्रा ने नेहरू मेडिकल कॉलेज में जूनियर रेसीडेंट की नौकरी भी की। दरअसल छात्रा 2008-09 बैच की थी। साढ़े 4 साल का कोर्स पूरा करने के बाद उन्होंने एक साल इंटर्नशिप भी रायपुर में ही की। वह रेडियो डायग्नोसिस विभाग में 8 माह से ज्यादा समय तक संविदा में जेआर की नौकरी करती रही। इसके बाद वह बिना कारण बताए ही नौकरी छोड़कर भी चली गई।                                  इन छात्रों पर आरोप था कि सीजीपीएमटी में इन्होंने अपने स्थान पर दूसरे छात्रों को परीक्षा में शामिल करवाया था। कई तरह की शिकायतों और कुछ प्रमाणिक दस्तावेज मिलने के बाद सीआईडी ने आईपीसी की धारा 420 के तहत इस मामले में एफआईआर दर्ज की थी। इसके बाद कुछ ने हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत के लिए आवेदन भी किया था। जमानत मिलने के बाद सभी नियमित रूप से एमबीबीएस की पढ़ाई करते रहे।                                        प्रदेश में 2008 से 2011 तक मुन्ना भाइयों के सहारे प्री मेडिकल टेस्ट पास करने का मामला सामने आया था। तब इस मामले पर एफआईआर भी दर्ज हुई थी। इसकी जांच का जिम्मा सीआईडी को दिया गया था। भास्कर की पड़ताल में पता चला है कि 50 छात्रों के थंब इंप्रेशन लेने के बाद भी कोई दोषी साबित नहीं हुआ। यह सभी छात्र नियमित रूप से एमबीबीएस की पढ़ाई करते रहे।                                                                                                शक के दायरे में शामिल छात्रों में एक छात्र 12 साल बाद भी एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी नहीं कर पाया है। वह 2008 बैच का है। फर्स्ट व सेकंड ईयर में लगातार फेल होता रहा। इस वजह से अभी तक वो पढ़ाई कर रहा है। एनएमसी का नया नियम उस समय लागू होता तो छात्र 4 अटेंप्ट या 4 साल में कॉलेज से बाहर हो जाता। लेकिन यह नया नियम 2019 से ही लागू हुआ है। इसलिए उसका कॉलेज से डॉक्टर बनकर ही निकलना तय है। 2003 के पहले भी यह नियम बनाया गया था, लेकिन उस समय यह लागू नहीं हो पाया था। इसका फायदा इस छात्र को मिल रहा है।

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