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सन्यासियों के लिए है द्वादशी का श्राद्ध, पितृगणों के अलावा साधुओं का भी इसी दिन किया जाता है श्राद्ध

रायपुर. हिन्दू धर्म में माता-पिता की सेवा को सबसे बड़ी पूजा माना गया है. इसलिए हिंदू धर्म शास्त्रों में पितरों का उद्धार करने के लिए पुत्र की अनिवार्यता मानी गई हैं. मृत्यु-उपरांत इसलिए उनका श्राद्ध करने का विशेष विधान बताया गया है. भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन कृष्णपक्ष अमावस्या तक के सोलह दिनों को पितृपक्ष कहते हैं जिसमे हम अपने पूर्वजों की सेवा करते हैं|

द्वादशी श्राद्ध महत्व: इस तिथि को परिवार के उन लोगों का श्राद्ध किए जाने का विधान है जिन्होंने संयास लिया हो. इस दिन पितृगणों के अलावा साधुओं व संयासियों का भी श्राद्ध किया जाता है. यह श्राद्ध मूलतः उन पितृगणों के निमित किया जाता है जिन्होनें अपने जीवन में सन्यास का मार्ग धारण किया हो अथवा जो सन्यास आश्रम की ओर अग्रसर हुए हों.

द्वादशी तिथि का श्राद्ध कर्म: शास्त्रों के अनुसार द्वादशी तिथि के श्राद्धकर्म में सात ब्राह्मणों को भोजन कराने का विधान है. सर्वप्रथम नित्यकर्म से निवृत होकर घर की दक्षिण दिशा में सफेद वस्त्र बिछाएं. पितृगण के चित्र अथवा प्रतीक हरे वस्त्र पर स्थापित करें. पितृगण के निमित, तिल के तेल का दीपक जलाएं, सुगंधित धूप करें, जल में चंदन और तिल मिलाकर तर्पण करें. चंदन और तुलसी पत्र समर्पित करें. इसके उपरांत ब्राह्मणों को मखाने की खीर, पूड़ी, सब्जी, साबूदाने से बने पकवान, लौंग-ईलायची तथा मिश्री अर्पित करें. भोजन के बाद सभी को यथाशक्ति वस्त्र, धन दक्षिणा देकर उनको विदा करने से पूर्व आशीर्वाद लें|

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