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औरैया हादसे की कहानी, घायलों की जुबानी / पैसे न होने की वजह से जा रहे थे घर; किसी के दो बच्चे हैं घायल; तो किसी को पैसे मांगने पर ठेकेदार देता था गालियां

पहली कहानी: पैसे मांगने पर गाली देता था ठेकेदार, इसलिए राजस्थान से भाग आए
शम्भू को अपने घर झारखंड जाने के लिए तकरीबन 1400 किमी का सफ़र तय करना है। 21 वर्षीय शम्भू बताते हैं- “झारखंड में उसके भाई और माता पिता रहते हैं। राजस्थान में मैं 2 साल मार्बल कंपनी में काम कर रहा था। महीने की 8 हजार की पगार से उन्हें 4 से 5 हजार रुपए भेज दिया करता था अब वह भी बंद है। लॉकडाउन लगने के बाद ठेकेदार से पैसे मांगता तो वह गाली देता था, इसलिए राजस्थान से भागकर घर जाना ही उचित समझा। राजस्थान से औरैया तक अभी उसने आधी से भी कम दूरी तय की है और उसके साथ भयानक हादसा हो गया है।”

शम्भू कहता है- “हड्डियों में दर्द हो रहा है। मुझे हादसे के बाद अभी होश आया है। आगे बात करने पर कहता है कि जो कुछ बचा खुचा था उसी से खर्च चल रहा था। जब हमारे साथी आने को तैयार हुए तो हम भी तैयार हो गए। अभी दो दिन पहले ही हम राजस्थान से निकले थे। करीब सौ-सवा सौ किमी पैदल चले तो पुलिस ने पकड़ लिया। वहां मीडिया वाले भी आ गए थे तो खाना खिलाकर हमें बस में बिठा दिया गया। झांसी से पहले हमें उतार दिया गया। वहां से हम और हमारे साथ तकरीबन 50 से 60 लोग इस ट्रक पर सवार हुए।”

“ट्रक वाले को झारखंड तक पहुंचने के लिए पैसे भी दिए थे।रात करीब 3 से 4 के बीच हम लोग ट्रक पर थे और ट्रक खड़ा हुआ था तभी पीछे से किसी ट्रक ने टक्कर मर दी और हम लोग बोरियों के नीचे दब गए। इसके बाद मुझे याद नहीं। अभी अस्पताल में मुझे होश आया है। मेरे साथ गाँव के बगल का एक साथी था वह मुझे कहीं दिखाई नहीं दे रहा है।  शम्भू को चिंता है कि वह अब आगे घर कैसे पहुंचेगा. साथ में जो थोडा बहुत सामान था वह भी गायब है।” 

 

दूसरी कहानी:  अचानक तेज अवाज हुई और हम चूने की बोरियों के नीचे दब गए
औरैया से सैफई मेडिकल कॉलेज आये धनंजय के खून सने सिर पर पट्टी बंधी हुई है। चेहरे पर मास्क लगा हुआ है। दर्द की वजह से हाथ टेढा मोड़ा हुआ है। धनंजय बताते हैं- ” हम लोग ट्रक पर सो रहे थे कि अचानक से तेज आवाज आई। आंख खुली तो हम चुने की बोरियों के नीचे दबे हुए थे। हमारा दम घुट रहा था और हम बेहोश हो गए। मैं राजस्थान में मार्बल कंपनी में काम करता हूं। लॉकडाउन की वजह से काम बंद हो गया था। पैसे भी मिलने बंद हो गए थे। हमने पहले अप्रैल में निकलने की कोशिश की थी लेकिन हमें निकलने नहीं दिया गया काफी सख्ती की वजह से हम डर गए थे। ठेकेदार हमारी सुन नहीं रहा था तो अब हम झारखंड घर जाने के लिए निकले थे। घर में मां और बाबू जी है। अब मुझे चिंता हो रही है कि उन्हें कैसे पता चलेगा। 

तीसरी कहानी: इस मां के दो बच्चे एडमिट हैं
मां की गोद में बैठी बच्ची सहमी है। मां सिसकियां भर रही है। उसके दो बच्चे घायल हैं और सैफई पीजीआई में एडमिट हैं। क्रांति देवी अस्पताल के बाहर बैठकर बच्चों के लिए प्रार्थना कर रही है। उनके परिवार पति, देवर और तीन बच्चे हैं। पति और देवर बच्चों की तीमारदारी में लगे हुए हैं। क्रांति कहती हैं- “दिल्ली में रहती है और उन्हें छतरपुर जाना है। दिल्ली से गाजियाबाद तक हम लोग पैदल पहुंचे हैं। रास्ते में बड़ी मिन्नतों के बाद हम लोग ट्रक में बैठ पाए थे। अब मेरे बच्चों का क्या होगा यह चिंता खाए जा रही है। क्रांति बोली कि हम बच्चों को लेकर सो रहे थे तभी टक्कर हुई। हमें कुछ याद नहीं। जब आंख खुली तो हम सही सलामत थे। तीनो बच्चे अगल बगल ही गिरे थे। दो बच्चों को खून निकल रहा था। हम घबराए हुए थे लेकिन पुलिस वालों ने हम सबको एम्बुलेंस से इस अस्पताल में भेज दिया।”

 

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