उदयपुर में हुई क्रूर हत्या का अमरनाथ में असर, रात 3 बजे शुरू हुई टेलर की हत्या पर चर्चा, देखते ही देखते हाथों में तिरंगे आ गए

29 जून, रात के करीब 3 बजे। गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश जैसे तमाम राज्यों से जम्मू पहुंचे हजारों अमरनाथ यात्री भगवती कैंप में जमा हो चुके हैं। ये जम्मू में अमरनाथ यात्रा का बेस कैंप है और चारों तरफ सुरक्षाबलों का कड़ा पहरा है।
अब तक यात्रियों के सामान का सिक्योरिटी चेक हो चुका है और यात्री बसों में बैठने के लिए जुट चुके हैं। भास्कर की टीम भी अमरनाथ यात्रा के लिए जम्मू से रवाना होने वाले पहले जत्थे में शामिल हुई और हमने वहां पल-पल का माहौल को देखा। जो देखा, वही लिख रहे हैं…
रात 3.30 बजे बस में बैठने का अनाउंसमेंट हुआ…

जम्मू बेस कैंप में यात्रियों को बसों में बैठने का अनाउंसमेंट किया गया। यात्रियों की चहल-पहल बढ़ने लगी। बेस कैंप की पार्किंग में अचानक से हाथ में तिरंगा लिए एक जत्था आता है और जोर-जोर से नारे लगने लगते हैं- भारत माता की जय, बम बम भोले।
बातें 370 हटाए जाने की तारीफों से शुरू हुई, कुछ देर में एक दिन पहले ही उदयपुर में हुई टेलर की क्रूर हत्या की चर्चा भी भीड़ में शुरू हो गई। बातें अब सांप्रदायिक उन्माद में बदलने लगीं।
पुलिस ने माहौल को भांपते हुए भीड़ को तितर-बितर कर दिया। इतने में अमरनाथ यात्रा के लिए पहला जत्था रवाना होने के लिए तैयार हो चुका था। पहले बालटाल के रास्ते जाने वाले यात्रियों की बसों को रवाना किया गया।
बाबा बर्फानी के धाम तक पहुंचने के दो रास्ते
अमरनाथ में बाबा बर्फानी की गुफा तक पहुंचने के दो रास्ते हैं- पहला रास्ता है पहलगाम, ये पारंपरिक रास्ता है जिसकी चढ़ाई आसान है लेकिन 47 किमी के इस रास्ते को तय करने में 2-3 तीन दिन लग जाते हैं।
वहीं दूसरा रास्ता है वाया बालटाल, ये नया ट्रैकिंग रूट है जो पहलगाम की तुलना में आधे से भी कम (14 किमी) है और इसकी चढ़ाई एक दिन में ही की जा सकती है।
अब यात्रियों का पहला जत्था जम्मू से कश्मीर की तरफ बढ़ चुका था। जत्थे के आगे, पीछे और बीच में सुरक्षाबलों की हाई टैक्नोलॉजी से लैस गाड़ियां और उस पर तैनात AK47 और इनसास रायफलधारी जवान। जम्मू से जब बस ने पहाड़ी चढ़ना शुरू किया तो तगड़ा सुरक्षा बंदोबस्त यात्रा पर मंडरा रहे आतंकी हमले के खतरे का एहसास करा रहे थे।
बंकर्स और पहाड़ पर जवान तैनात

सड़क के किनारे बने बंकर्स, पहाड़ों की ऊंचाई पर पेड़ की ओट लिए जवान, इमारतों पर तैनात स्नाइपर्स, सायरन बजाती सुरक्षाबलों की गाड़ियों के दस्ते और यात्रियों के लिए वन वे ट्रैफिक रूट।
इतने तगड़े सुरक्षा बंदोबस्त महसूस करा रहे थे कि कोई चाहे भी तो इस सिक्योरिटी को नहीं तोड़ सकता। करीब 2 घंटे के सफर के बाद रास्ते में लगे हुए लंगरों में नाश्ता किया। जत्था फिर चल पड़ा।
बनिहाल टनल ही वो पॉइंट है, जो जम्मू और कश्मीर को बांटती है। आम दिनों में जम्मू से बनिहाल टन के बीच इस तरह के सुरक्षा इंतजामात नहीं होते हैं लेकिन अमरनाथ यात्रा के मद्देनजर ही पूरे रास्ते को छावनी में बदला गया।
जब यात्री बसों का जत्था गुजरता है तो बाकी सभी ट्रैफिक को रोक दिया जाता है और पूरे रास्ते को सिक्योरिटी की भाषा में सैनिटाइज किया जाता है। जिस तरह पुलवामा में आत्मघाती हमला हुआ था, उस तरह के हमलों से बचने के लिए ही ये पूरी ड्रिल की जाती है।

आतंक के गढ़ साउथ कश्मीर में भी लगे नारे
बनिहाल टनल पार करते ही शुरू होता है साउथ कश्मीर, जहां आतंकी घटनाएं होना बहुत आम बात है। टनल पार करने के बाद हम जब अनंतनाग जिले के शहरी इलाके में घुसे तो अचानक यात्री बसों के जत्थों सो जोर-जोर से नारे लगने लगे- भारत माता की जय, हिंदुस्तान जिंदाबाद, हर-हर महादेव।
सड़कों पर भारी सुरक्षा की वजह से चहल-पहल काफी कम थी सूनी थीं, लेकिन दुकानें, स्कूल, दफ्तर सब कुछ आम दिनों की तरह लग रहा था।
कश्मीरी महिलाओं ने हाथ दिखाकर किया वेलकम

सड़कों पर खड़े आम कश्मीरी यात्री जत्थों को टकटकी निगाह से देख रहे थे। कुछ की निगाहों में एक अनजानापन सा दिखाई दे रहा था, शायद जोर-जोर से लग रहे नारे इन्हीं निगाहों की जवाबी प्रतिक्रिया थी।
यात्री दस्तों में शामिल महिलाओं ने जब कश्मीरी महिलाओं की तरफ हाथ हिलाया, तो उस तरफ से उतने ही प्यार से जवाब मिला।
सुबह 4 बजे से रवाना हुआ जत्था शाम को 5 बजे पहलगाम स्थित बेस कैंप में पहुंचा। 30 तारीख को अलसुबह यहां से चंदनवाड़ी के लिए यात्रा शुरू हुई। 30 को ही बाबा के पहले दर्शन होना हैं। यह सिलसिला 11 अगस्त तक जारी रहेगा



