कवर्धा : विराट लक्ष्मी नारायण महायज्ञ का किया गया आयोजन

कवर्धा| जिला अंतर्गत ग्राम बैहरसरी में विराट लक्ष्मी नारायण महायज्ञ एवं राम कथा महोत्सव के अंतर्गत यज्ञ कार्य के अंतर्गत महा यज्ञ मंडप में शिव जी का महा मस्तकाभिषेक और लक्ष्मी नारायण जी का सहस्त्रार्चन संपन्न हुआ यज्ञ की महिमा पर यज्ञ आचार्य रामप्रताप शास्त्री जी ने कहा की हमारी प्राचीन संस्कृति को अगर एक ही शब्द में समेटना हो तो वह है यज्ञ। यज्ञ शब्द संस्कृत की यज् धातु से बना हुआ है जिसका अर्थ होता है दान, देवपूजन एवं संगतिकरण। भारतीय संस्कृति में यज्ञ का व्यापक अर्थ है, यज्ञ मात्र अग्निहोत्र को ही नहीं कहते हैं वरन् परमार्थ परायण कार्य भी यज्ञ है। यज्ञ स्वयं के लिए नहीं किया जाता है बल्कि सम्पूर्ण विश्व के कल्याण के लिए किया जाता है। यज्ञ का प्रचलन वैदिक युग से है, वेदों में यज्ञ की विस्तार से चर्चा की गई है, बिना यज्ञ के वेदों का उपयोग कहां होगा और वेदों के बिना यज्ञ कार्य भी कैसे पूर्ण हो सकता है।
यज्ञ और वेदों का अन्योन्याश्रय संबंध है। जिस प्रकार मिट्टी में मिला अन्न कण सौ गुना हो जाता है, उसी प्रकार अग्नि से मिला पदार्थ लाख गुना हो जाता है। अग्नि के संपर्क में कोई भी द्रव्य आने पर वह सूक्ष्मीभूत होकर पूरे वातावरण में फैल जाता है और अपने गुण से लोगों को प्रभावित करता है। इसको इस तरह समझ सकते हैं कि जैसे लाल मिर्च को अग्नि में डालने पर वह अपने गुण से लोगों को प्रताडि़त करती है इसी तरह सामग्री में उपस्थित स्वास्थ्य वर्धक औषधियां जब यज्ञाग्नि के संपर्क में आती है तब वह अपना औषधीय प्रभाव व्यक्ति के स्थूल व सूक्ष्म शरीर पर दिखाती है और व्यक्ति स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करता चला जाता है वेद मंत्रों के द्वारा सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय हजारों आहुतियां यज्ञ मंडप में नित्य प्रदान की जाती है भारी संख्या में भक्तजन यज्ञ नारायण की परिक्रमा और कथा का अपुर्व लाभ प्राप्त कर रहे हैं आयोजक समिति के लोगों ने इस पावन यज्ञ का लाभ लेने के लिए समस्त क्षेत्रवासियों का कवर्धा जिला अंतर्गत ग्राम बैहरसरी में विराट लक्ष्मी नारायण महायज्ञ एवं राम कथा महोत्सव के अंतर्गत यज्ञ कार्य के अंतर्गत महा यज्ञ मंडप में शिव जी का महा मस्तकाभिषेक और लक्ष्मी नारायण जी का सहस्त्रार्चन संपन्न हुआ यज्ञ की महिमा पर यज्ञ आचार्य आचार्य रामप्रताप शास्त्री जी ने कहा की हमारी प्राचीन संस्कृति को अगर एक ही शब्द में समेटना हो तो वह है यज्ञ। यज्ञ शब्द संस्कृत की यज् धातु से बना हुआ है जिसका अर्थ होता है दान, देवपूजन एवं संगतिकरण। भारतीय संस्कृति में यज्ञ का व्यापक अर्थ है, यज्ञ मात्र अग्निहोत्र को ही नहीं कहते हैं वरन् परमार्थ परायण कार्य भी यज्ञ है। यज्ञ स्वयं के लिए नहीं किया जाता है बल्कि सम्पूर्ण विश्व के कल्याण के लिए किया जाता है। यज्ञ का प्रचलन वैदिक युग से है, वेदों में यज्ञ की विस्तार से चर्चा की गई है, बिना यज्ञ के वेदों का उपयोग कहां होगा और वेदों के बिना यज्ञ कार्य भी कैसे पूर्ण हो सकता है।
यज्ञ और वेदों का अन्योन्याश्रय संबंध है। जिस प्रकार मिट्टी में मिला अन्न कण सौ गुना हो जाता है, उसी प्रकार अग्नि से मिला पदार्थ लाख गुना हो जाता है। अग्नि के संपर्क में कोई भी द्रव्य आने पर वह सूक्ष्मीभूत होकर पूरे वातावरण में फैल जाता है और अपने गुण से लोगों को प्रभावित करता है। इसको इस तरह समझ सकते हैं कि जैसे लाल मिर्च को अग्नि में डालने पर वह अपने गुण से लोगों को प्रताडि़त करती है इसी तरह सामग्री में उपस्थित स्वास्थ्य वर्धक औषधियां जब यज्ञाग्नि के संपर्क में आती है तब वह अपना औषधीय प्रभाव व्यक्ति के स्थूल व सूक्ष्म शरीर पर दिखाती है और व्यक्ति स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करता चला जाता है वेद मंत्रों के द्वारा सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय हजारों आहुतियां यज्ञ मंडप में नित्य प्रदान की जाती है भारी संख्या में भक्तजन यज्ञ नारायण की परिक्रमा और कथा का अपुर्व लाभ प्राप्त कर रहे हैं आयोजक समिति के लोगों ने इस पावन यज्ञ का लाभ लेने के लिए समस्त क्षेत्रवासियों का



