छत्तीसगढ़ विशेषजरा हटकेसियासत

सिंहदेव मौन से मुखर

तहलका मचा अक्टूबर 2021

अचानक 16 विधायकों के दिल्ली जाने से स्वास्थ्य
मंत्री टीएस सिंहदेव की बेचैनी बढ़ी रही। दिल्ली प्रवास वाले विधायकों में सिहदेव के विरोधी बृहस्पत सिंह भी शामिल हैं। ये विधायक होटल में डेरा डाले रहे। खबर के अनुसार ये सभी प्रदेश कांग्रेस प्रभारी पीएल पुनिया से मुलाकात करेंगे। दरअसल आलाकमान तक पहुंचने के लिए वे पुल का काम कर रहे हैं। पुनिया का सियासी
चरित्र जिधर बम उधर हम है। पूर्व में सिंहदेव को
पकड़े रहे अब उनका पलड़ा भूपेश बघेल की और स्पष्ट रूप से दिख रहा है। इसके पीछे लक्ष्मी जी की माया जो है। विधायकों के दिल्ली दौरे से सूबे में नेतृत्व परिवर्तन की अटकलें फिर शुरू हो गई है। विधायकोंके दिल्ली कूच के मायने निकाले जा रहे हैं। इसे लेकर 29 सितंबर को पत्रकारों ने सिंहदेव से सवाल किया विधायक दिल्लीजाकर सूबे के सियासी हाल और विकास कार्यों की चर्चा की बात हैं?

इसे किस रूप में लेते हैं? इस पर
उन्होंने खुल कर कहा, हम सब जानते हैं छत्तीसगढ़ की राजनीति में क्या चर्चाएं हो रही है। बदलाव की बात है तो ये हो सकता है या नहीं, यह देखना होगा। मगर यह बाल अब खुल गई है। उन्होंने कहा, पिछली बार भी जबविधायक दिल्ली गए तो बात खुल गई थी। हो सकता है.
इसी को लेकर वे अपनी बात रखने गए हों। सिंहदेव मौनरह कर अथवा कम बोल कर सियासत करने वाले नेता है लेकिन जिस ढंग से फिर से शक्ति प्रदर्शन
प्रदर्शन कराया गया इससे वे अंदरूनी तौर पर आहत होने के साथ ही मुखर भी हो रहे हैं। वे शाब्दिक रूप से कठोरता की और बढ़ रहे हैं। विधायकों के दिल्ली दौड़ से चाहें जो हो लेकिन इतना स्पष्ट हो गया है कि भूपेश बघेल नए सिरे से मोर्चाबंदी कर १ चुके । हैं। इसे लेकर कहा जा सकता है कि अब भी उनकी कुर्सी डोल रही है। सियासी गलियारे से मिला जानकारी के अनुसार इस बार भले विधायक16गए हो लेकिन वे सूबे के 46 विधायकों भूपेश बघेल के समर्थन का पत्र भी लेकर गए सवालयह है कि क्या इससे भूपेश बघेल की कुर्सी बच जाएंगी? इसका जवाब तो आने वाले वक्त में मिलेगा लेकिन फौरी तौर बात यह है कि भूपेश बघेल की रातों की नींद उड़ी हुई है।

उन्हें हर पल राहुल गांधी फरमान व सिंहदेव की ताजपोशी की चिंता सताए जा रही है। दिल्ली प्रवास पर गए विधायक कह रहे हैं वे गांधी से सूबे के विकास दिखाने का आमंत्रण देने राहुल
गए हैं।

सवाल यह है बीते 34 माह में ऐसा कौन सा
विकास हो गया है जिसे वे राहुल गांधी को दिखाने
आमंत्रण देने गए हैं। सच तो यह है भूपेश बघेल सरकारपिछली डॉ. रमन सिंह सरकार के विकास को भी संभाल कर नहीं रख पा रही है। सिहदेव सवाल करते हैं विकास दिखाने का आमंत्रण तो मुख्यमंत्री स्वयं देने जाना चाहिए भला विधायक किस लिहाज से जाएंगे। बात वाजिब है। ऐसा कतई नहीं है। पिछली दौरे में भी भूपेश
बघेल ने मीडिया के सवाल पर कहा था विधायक दिल्ली के राष्ट्रीय नेताओं को प्रदेश में हो रहे अच्छे कामों को दिखाने निमंत्रण देने गए थे। इस बार भी दबी जुबान मीडिया में यही मैसेज देने प्रयास किया गया,

लेकिन यह झूठ है। इस सियासी गुटीय राजनीति व उठापटक में
सिंहदेव यह जरूर कह गए कि पार्टी में स्वार्थ नहीं
कमिटमेंट सर्वोपरि होता है। यह कह कर एक तरह से
उन्होंने आलाकमान की भी घेरेबंदी की है। उनके बयान में झलक रहा है कि कमिटमेंट किया है तो निभाया ही जाना चाहिए। ऐसा कर वे पहली बार खुल कर आलाकमान पर दबाव बनाते दिख रहे हैं। सच यह है।
आलाकमान पंगु हो चुका है। कमिटमेंट पूरा करना
उनके वश की बात नहीं रह गई है। देखा जाए तो
[संहदेव आलमान व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की गुटीय
राजनीति में पूरी तरह से घिर गए है। उससे वे निकलने की कोशिश नहीं कर रहे लेकिन धीरे से आलाकमान को समझ जाएंगे कि वे कुछ करने वाले नहीं हैं। सूबे में जो बचे 24 विधायकों को पालेबंदी कर लें अन्यथा कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है। यह बेहद सहज बात है कि जिस आलाकमान की चौखट पर बार-बार गुटीय राजनीति की जा रही और वे मौन है। इसका साफ
आशय यह है कि वे कमटिमेंट पूरा करने वाले नहीं है।
अभी भी कुछ बिगड़ा नहीं है सब कुछ हाथ में आ सकता
है लेकिन सिंहदेव जिस सियासी वाहन में सवार हैं वे
संभवत: मुकम्मल मंजिल तक पहुंचाने वाले नहीं है।

सीनियर विधायकों
ने कन्नी काटी भूपेश बघेल की दबाद की राजनीति से संभवतः कांग्रेस
के सीनियर विधायकों ने दूरी बना ली है। इसीलिए न तो उन्होंने समर्थन पत्र में हस्ताक्षर किए और न ही लॉबिंग का हिस्सा बने। अब तो वे दूरी बना कर चल रहे हैं। इस लॉबिंग वाले केवल एक ही सीनियर विधायक/मंत्री शामिल हैं जो पिछले पौने तीन साल से जमकर मलाई काट रहे हैं। इस विधायक/मंत्री को सीएम भूपेश बघेल बयानवीर बना कर रखे हैं, लेकिन वे चतुर है। इसलिए मौका देख कर ही चौका लगाते । है। उन्हें लगता है
मामला उल्टा पड़ सकता है तो कछुए की तरह सारे अंग सिकोड़ लेते हैं। इसके चलते दिल्ली मोर्चेबंदी के लिए बृहस्पत सिंह जैसे कच्चे खिलाड़ी का चयन करना उनके साथ गए अधिकांश विधायक पहली बार चुने हुए
लोग हैं जो कांग्रेस की राजनीति को ठीक ढंग से सीखना तो दूर जान भी नहीं पाए हैं। यह बात आइने की तरह साफ है कि इन विधायकों को कुछ भी हासिल नहीं होने वाला है। वे उल्टे पांव लौटा दिए जा सकते हैं।

यदि ऐसा ही होता है तो फिर भूपेश बघेल की राजनीतिक शैली पर सवाल उठना शुरू हो जाएगा।

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